ଶ୍ରୀଭଗବାନୁବାଚ
ଅନାଶ୍ରିତଃ କର୍ମଫଳଂ କାର୍ଯ୍ୟଂ କର୍ମ କରୋତି ଯଃ ।
ସ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ ଚ ଯୋଗୀ ଚ ନ ନିରଗ୍ନିର୍ନ ଚାକ୍ରିୟଃ ॥ ୧ ॥
ଶ୍ରୀ-ଭଗବାନ୍ ଉବାଚ — ଭଗବାନ କହିଲେ; ଅନାଶ୍ରିତଃ — ଆଶ୍ରୟ ନ ନେଇ; କର୍ମ-ଫଳମ୍ — କର୍ମର ଫଳ; କାର୍ଯ୍ୟମ୍ — କର୍ତ୍ତବ୍ୟ; କର୍ମ — କର୍ମ; କରୋତି — କରେ; ଯଃ — ଯିଏ; ସଃ — ସେ; ସନ୍ନ୍ୟାସୀ — ସନ୍ନ୍ୟାସୀ; ଚ — ମଧ୍ୟ; ଯୋଗୀ — ଯୋଗୀ; ନ — ନୁହେଁ; ନିଃ — ବିନା; ଅଗ୍ନିଃ — ଅଗ୍ନି; ନ — ନୁହେଁ; ଚ — ମଧ୍ୟ; ଅକ୍ରିୟଃ — କର୍ତ୍ତବ୍ୟହୀନ।
ଶ୍ରୀ ଭଗବାନ କହିଲେ: ଯିଏ ନିଜ କର୍ମର ଫଳ ପ୍ରତି ଆସକ୍ତ ନ ହୋଇ, କର୍ତ୍ତବ୍ୟବୋଧରୁ ନିଜ କର୍ମ କରେ, ସେହି ବ୍ୟକ୍ତି ସନ୍ନ୍ୟାସୀ ଏବଂ ପ୍ରକୃତ ଯୋଗୀ। ଯିଏ କେବଳ ଅଗ୍ନି ଜଳାଏ ନାହିଁ କିମ୍ବା ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପାଳନ କରେ ନାହିଁ, ସେ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ କିମ୍ବା ଯୋଗୀ ନୁହେଁ।
ଏହି ଅଧ୍ୟାୟରେ ଭଗବାନ ବ୍ୟାଖ୍ୟା କରିଛନ୍ତି ଯେ, ଅଷ୍ଟାଙ୍ଗ ଯୋଗ ପଦ୍ଧତି ମନ ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିବାର ଏକ ଉପାୟ। କିନ୍ତୁ ସାଧାରଣ ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ, ବିଶେଷକରି କଳିଯୁଗରେ, ଏହି ଅଷ୍ଟାଙ୍ଗ ଯୋଗ ପଦ୍ଧତି ଅନୁସରଣ କରିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ କଷ୍ଟକର। ଯଦିଓ ଏହି ଅଧ୍ୟାୟରେ ଅଷ୍ଟାଙ୍ଗ ଯୋଗର ସୁପାରିଶ କରାଯାଇଛି, ଭଗବାନ ଏଠାରେ କର୍ମଯୋଗ, ଅର୍ଥାତ୍ କୃଷ୍ଣଚେତନାରେ କର୍ମ କରିବାକୁ ଅଧିକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୋଲି ଗୁରୁତ୍ୱ ଦେଇଛନ୍ତି।
ଏହି ଜଗତରେ ପ୍ରତ୍ୟେକେ ନିଜ ପରିବାର ଓ ସେମାନଙ୍କର ଆବଶ୍ୟକତା ପୂରଣ ପାଇଁ କାର୍ଯ୍ୟ କରନ୍ତି। କିନ୍ତୁ କେହି ମଧ୍ୟ କୌଣସି ନ କୌଣସି ସ୍ୱାର୍ଥ କିମ୍ବା ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ସନ୍ତୁଷ୍ଟିର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ବିନା କାର୍ଯ୍ୟ କରନ୍ତି ନାହିଁ। ସେହି ସ୍ୱାର୍ଥ ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ହୋଇପାରେ କିମ୍ବା ବିସ୍ତୃତ ରୂପରେ ହୋଇପାରେ।
ପରିପୂର୍ଣ୍ଣତାର ମାପଦଣ୍ଡ ହେଉଛି କର୍ମର ଫଳ ଉପଭୋଗ କରିବାର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ନୁହେଁ, ବରଂ କୃଷ୍ଣଚେତନାରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବା। କୃଷ୍ଣଚେତନାରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଜୀବର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ, କାରଣ ସ୍ୱଭାବତଃ ସମସ୍ତ ଜୀବ ପରମେଶ୍ୱରଙ୍କର ଅଂଶ ଓ ଅବିଚ୍ଛିନ୍ନ ଅଂଶ।
ଶରୀରର ବିଭିନ୍ନ ଅଙ୍ଗ ସମଗ୍ର ଶରୀରର ସନ୍ତୁଷ୍ଟି ପାଇଁ କାର୍ଯ୍ୟ କରନ୍ତି। ଶରୀରର ଅଙ୍ଗଗୁଡ଼ିକ ନିଜର ସନ୍ତୁଷ୍ଟି ପାଇଁ ନୁହେଁ, ସମଗ୍ର ଶରୀରର ସନ୍ତୁଷ୍ଟି ପାଇଁ କାର୍ଯ୍ୟ କରନ୍ତି। ସେହିପରି, ଯେଉଁ ଜୀବ ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ସନ୍ତୁଷ୍ଟି ପାଇଁ ନୁହେଁ, ବରଂ ପରମ ସମଗ୍ରଙ୍କ ସନ୍ତୁଷ୍ଟି ପାଇଁ କାର୍ଯ୍ୟ କରେ, ସେହି ବ୍ୟକ୍ତି ହିଁ ପ୍ରକୃତ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ ଏବଂ ପ୍ରକୃତ ଯୋଗୀ।
କେତେକ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ କୃତ୍ରିମ ଭାବରେ ଭାବନ୍ତି ଯେ ସେମାନେ ସମସ୍ତ ଭୌତିକ କର୍ତ୍ତବ୍ୟରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇଯାଇଛନ୍ତି। ତେଣୁ ସେମାନେ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର ଯଜ୍ଞ ଭଳି ଅଗ୍ନି-ଯଜ୍ଞ କରିବା ବନ୍ଦ କରିଦିଅନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ପ୍ରକୃତରେ ସେମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ସ୍ୱାର୍ଥ ରହିଥାଏ, କାରଣ ସେମାନଙ୍କର ଲକ୍ଷ୍ୟ ନିରାକାର ବ୍ରହ୍ମରେ ଏକୀଭୂତ ହେବା। ଏହି ଇଚ୍ଛା ଯେକୌଣସି ଭୌତିକ ଇଚ୍ଛାଠାରୁ ଅଧିକ ଉଚ୍ଚ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଏହା ସ୍ୱାର୍ଥରୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ମୁକ୍ତ ନୁହେଁ।
ସେହିପରି, ଅର୍ଦ୍ଧ-ନିମୀଳିତ ଚକ୍ଷୁରେ ଯୋଗ ପଦ୍ଧତିର ଅଭ୍ୟାସ କରୁଥିବା ଏବଂ ସମସ୍ତ ଭୌତିକ କାର୍ଯ୍ୟରୁ ବିରତ ଥିବା ଜଣେ ମିଷ୍ଟିକ୍ ଯୋଗୀ ମଧ୍ୟ ନିଜର ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ସନ୍ତୁଷ୍ଟି କାମନା କରିପାରନ୍ତି।
କିନ୍ତୁ କୃଷ୍ଣଚେତନାରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି ସମଗ୍ରଙ୍କ ସନ୍ତୁଷ୍ଟି ପାଇଁ କାର୍ଯ୍ୟ କରନ୍ତି ଏବଂ ତାଙ୍କର କୌଣସି ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ସ୍ୱାର୍ଥ ନଥାଏ। କୃଷ୍ଣଚେତନାରେ ଥିବା ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କର ନିଜର ସନ୍ତୁଷ୍ଟି ପାଇଁ କୌଣସି ଇଚ୍ଛା ନଥାଏ। ତାଙ୍କର ସଫଳତାର ମାପଦଣ୍ଡ ହେଉଛି କୃଷ୍ଣଙ୍କ ସନ୍ତୁଷ୍ଟି। ତେଣୁ ସେହି ବ୍ୟକ୍ତି ହିଁ ପ୍ରକୃତ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ ଏବଂ ପ୍ରକୃତ ଯୋଗୀ।
ସନ୍ନ୍ୟାସର ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଆଦର୍ଶ ଶ୍ରୀ ଚୈତନ୍ୟ ମହାପ୍ରଭୁ ଏହିପରି ପ୍ରାର୍ଥନା କରିଛନ୍ତି:
ନ ଧନଂ ନ ଜନଂ ନ ସୁନ୍ଦରୀଂ
କବିତାଂ ବା ଜଗଦୀଶ କାମୟେ ।
ମମ ଜନ୍ମନି ଜନ୍ମନୀଶ୍ୱରେ
ଭବତାଦ୍ ଭକ୍ତିରହୈତୁକୀ ତ୍ୱୟି ॥
“ହେ ସର୍ବଶକ୍ତିମାନ ପ୍ରଭୁ, ମୋର ଧନ ସଞ୍ଚୟ କରିବାର କୌଣସି ଇଚ୍ଛା ନାହିଁ, ସୁନ୍ଦରୀ ନାରୀଙ୍କୁ ଭୋଗ କରିବାର ମଧ୍ୟ ଇଚ୍ଛା ନାହିଁ। ମୋର ଅନେକ ଅନୁଗାମୀ ମଧ୍ୟ ଦରକାର ନାହିଁ। ମୁଁ କେବଳ ଏତିକି ଚାହେଁ ଯେ, ଜନ୍ମ ଜନ୍ମାନ୍ତର ଧରି ମୋ ଜୀବନରେ ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରତି ଅହୈତୁକୀ ଭକ୍ତି ରହୁ।”
ଏହି ଶ୍ଲୋକ ଆମକୁ ଶିଖାଏ ଯେ ପକ୍ଷପାତ ଓ ମୋହ ମନୁଷ୍ୟର ବିବେକକୁ ଆଚ୍ଛାଦିତ କରିଦିଏ। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ନ୍ୟାୟ ଅପେକ୍ଷା ନିଜ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସ୍ୱାର୍ଥକୁ ଅଧିକ ମହତ୍ତ୍ୱ ଦେଇଥିଲେ। ଜୀବନରେ ସଠିକ୍ ନିଷ୍ପତ୍ତି ନେବା ପାଇଁ ଆମକୁ ସତ୍ୟ, ଧର୍ମ ଏବଂ ନିରପେକ୍ଷ ଦୃଷ୍ଟିଭଙ୍ଗୀକୁ ଅନୁସରଣ କରିବା ଆବଶ୍ୟକ।
śrī-bhagavān uvāca
anāśritaḥ karma-phalaṁ
kāryaṁ karma karoti yaḥ
sa sannyāsī ca yogī ca
na niragnir na cākriyaḥ
Synonyms
śrī–bhagavān uvāca — the Lord said; anāśritaḥ — without taking shelter; karma–phalam — of the result of work; kāryam — obligatory; karma — work; karoti — performs; yaḥ — one who; saḥ — he; sannyāsī — in the renounced order; ca — also; yogī — mystic; ca — also; na — not; niḥ — without; agniḥ — fire; na — nor; ca — also; akriyaḥ — without duty.
In this chapter the Lord explains that the process of the eightfold yoga system is a means to control the mind and the senses. However, this is very difficult for people in general to perform, especially in the Age of Kali. Although the eightfold yoga system is recommended in this chapter, the Lord emphasizes that the process of karma-yoga, or acting in Kṛṣṇa consciousness, is better.
Everyone acts in this world to maintain his family and their paraphernalia, but no one is working without some self-interest, some personal gratification, be it concentrated or extended. The criterion of perfection is to act in Kṛṣṇa consciousness, and not with a view to enjoying the fruits of work. To act in Kṛṣṇa consciousness is the duty of every living entity because all are constitutionally parts and parcels of the Supreme. The parts of the body work for the satisfaction of the whole body.
The limbs of the body do not act for self-satisfaction but for the satisfaction of the complete whole. Similarly, the living entity who acts for satisfaction of the supreme whole and not for personal satisfaction is the perfect sannyāsī, the perfect yogī.
The sannyāsīs sometimes artificially think that they have become liberated from all material duties, and therefore they cease to perform agnihotra yajñas (fire sacrifices), but actually they are self-interested because their goal is to become one with the impersonal Brahman. Such a desire is greater than any material desire, but it is not without self-interest. Similarly, the mystic yogī who practices the yoga system with half-open eyes, ceasing all material activities, desires some satisfaction for his personal self. But a person acting in Kṛṣṇa consciousness works for the satisfaction of the whole, without self-interest. A Kṛṣṇa conscious person has no desire for self-satisfaction. His criterion of success is the satisfaction of Kṛṣṇa, and thus he is the perfect sannyāsī, or perfect yogī. Lord Caitanya, the highest perfectional symbol of renunciation, prays in this way:
“O Almighty Lord, I have no desire to accumulate wealth, nor to enjoy beautiful women. Nor do I want any number of followers. What I want only is the causeless mercy of Your devotional service in my life, birth after birth.”
श्रीभगवान् उवाच — भगवान ने कहा, अनाश्रितः — आश्रय न लेने वाला, कर्मफलम् — कर्म के फल का।, कार्यम् — कर्तव्य।, कर्म — कर्म या कार्य।, करोति — करता है।, यः — जो व्यक्ति, सः — वह।, सन्न्यासी — संन्यास लेने वाला।, च — भी।, योगी — योगी या आत्म-साक्षात्कार का साधक।, न — नहीं, निः — बिना।, अग्निः — अग्नि।, न च — और न ही।, अक्रियः — कर्तव्य-कर्म न करने वाला।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: जो व्यक्ति अपने कर्मों के फल पर आश्रित हुए बिना अपना कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी और सच्चा योगी है। वह नहीं, जो अग्नि प्रज्वलित नहीं करता और कोई कर्तव्य-कर्म भी नहीं करता।
इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि अष्टांग योग की प्रक्रिया मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने का एक साधन है। हालाँकि, सामान्य लोगों के लिए इसका अभ्यास करना बहुत कठिन है, विशेषकर कलियुग में। यद्यपि इस अध्याय में अष्टांग योग की अनुशंसा की गई है, फिर भी भगवान इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कर्मयोग अर्थात् कृष्णभावनाभावित होकर कर्म करना अधिक श्रेष्ठ है।
इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार और परिवार से जुड़ी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कर्म करता है। लेकिन कोई भी व्यक्ति किसी न किसी स्वार्थ या व्यक्तिगत संतुष्टि की इच्छा के बिना कर्म नहीं करता, चाहे वह स्वार्थ सीमित हो या व्यापक। पूर्णता का वास्तविक मापदंड यह है कि मनुष्य कर्मों के फल का आनंद लेने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि कृष्णभावना में स्थित होकर कर्म करे।
प्रत्येक जीव का कर्तव्य है कि वह कृष्णभावना में रहकर कर्म करे, क्योंकि स्वभाव से सभी जीव परम भगवान के अंश और अभिन्न अंग हैं। शरीर के अंग पूरे शरीर की संतुष्टि के लिए कार्य करते हैं। वे अपने लिए अलग से संतुष्टि प्राप्त करने के उद्देश्य से कार्य नहीं करते, बल्कि संपूर्ण शरीर की सेवा करते हैं। इसी प्रकार, जो जीव अपने व्यक्तिगत सुख के बजाय परम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की संतुष्टि के लिए कार्य करता है, वही पूर्ण संन्यासी और पूर्ण योगी है।
कभी-कभी संन्यासी कृत्रिम रूप से यह सोचने लगते हैं कि वे सभी भौतिक कर्तव्यों से मुक्त हो गए हैं। इसलिए वे अग्निहोत्र यज्ञ अर्थात् अग्नि में आहुति देने वाले वैदिक यज्ञ करना बंद कर देते हैं। लेकिन वास्तव में उनके भीतर भी स्वार्थ की भावना हो सकती है, क्योंकि उनका लक्ष्य निराकार ब्रह्म में एकाकार होना होता है। ऐसी इच्छा भौतिक इच्छाओं से श्रेष्ठ हो सकती है, लेकिन फिर भी वह व्यक्तिगत स्वार्थ से पूरी तरह मुक्त नहीं है।
इसी प्रकार, वह रहस्यवादी योगी जो अर्ध-खुली आँखों से योग का अभ्यास करता है और सभी भौतिक गतिविधियों को रोक देता है, वह भी अपने व्यक्तिगत सुख या संतुष्टि की इच्छा रख सकता है।
इसके विपरीत, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के बिना संपूर्ण परम सत्ता की संतुष्टि के लिए कार्य करता है। कृष्णभावना में स्थित व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि की इच्छा नहीं रखता। उसकी सफलता का मापदंड भगवान श्रीकृष्ण की संतुष्टि है। इस प्रकार वह पूर्ण संन्यासी और पूर्ण योगी है।
त्याग की सर्वोच्च आदर्श प्रतिमूर्ति भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसी भावना को व्यक्त करते हुए प्रार्थना की:
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥
हिंदी भावार्थ:
हे सर्वशक्तिमान प्रभु! मुझे न तो धन-संपत्ति एकत्र करने की इच्छा है, न ही सुंदर स्त्रियों का भोग करने की, और न ही मुझे बहुत सारे अनुयायी चाहिए।
मेरी एकमात्र इच्छा है कि जन्म-जन्मांतर तक आपके प्रति मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे और मुझे आपकी प्रेममयी भक्ति-सेवा प्राप्त होती रहे।
मुख्य संदेश:
सच्चा संन्यास केवल संसार के कार्यों को छोड़ देना नहीं है। सच्चा संन्यास है अपने स्वार्थ और कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर अपने कर्तव्यों का पालन भगवान श्रीकृष्ण की संतुष्टि के लिए करना। यही कर्मयोग है और यही पूर्ण योगी का लक्षण है।